जन्मदिन विशेष- हाॅकी जादूगर मेजर ध्यानचंद की कहानी

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हाॅकी के जादूगर कहे जाने वाले मेजर ध्यानचंद्र के बारे में हमारी आज की युवा पीढी को उतना नही पता है जितना होना चाहिए, ध्यानचंद्र उन तमाम वजाहों में से एक हैं जिन पर हर भारतीय को गर्व होना चाहिए. दद्दा ध्यानचंद्र के जीवन और उनकी विलक्षण प्रतिभा को बताती कई कहानीयां हमारे सामने हैं जो हमे आज इस बात का एहसास कराती हैं की मेंजर साहब अपने वक्त के कई आगे की सोच रखतें थे.

हाॅलैंड में एक मैच के बाद उनकी हाॅकी तो कहा जाता है कि तोडकर देखा गया की उनकी हाॅकी के अंदर कही चुंबक तो नही गेंद उनके पास आने के बाद चिपक क्यों जाती हैं. दूसरी तरफ जपान के लोगों का कहना था, कि ध्यानचंद्र की हाॅकी में गोंद लगा हुआ है और गेंद इसलिए उसमें चिपक जाती है.

मेजर ध्यानचंद्र ने एक मैच के दौरान गोल दागा और गेंद गोल पोस्ट के खंबे से लगने के बाद वापस लौट गई, ध्यानचंद्र ने दावा किया की गोलपोस्ट छोटा है पर विरोधी टीम नही मानी मैच के बाद ध्यानचंद्र के दावों की जांच के लिए गोलपोस्ट को नापा गया दो गोलपोस्ट वाकई छोटा था.

दद्दा से जुडे ऐसे कई किस्से है जिन्हे सुनकर हर भारतीय से सुना गर्व से फूल जाता है, ध्यानचंद्र ने 3 ओपंपिक गोल्डमेडल जीते और इंटरनेशनल टूर्नामेंट में करीब 400 बार गोल दागे उन्होने भारतीय टीम के लिए 22 साल हाॅकी खेली.

ध्यानचंद्र का जन्म 29 अगस्त 1905 को इलाहाबाद में हुआ और अपनी पढाई पूरी करने के बाद वो दिल्ली आ गए और  सेना की ब्राहम्ण रेडीमेंड में बतौर जवान भर्ती हो गए. कहा जाता है की उनके अंदर बचपन से ही खेलों और हाॅकी के प्रति कोई दिलचस्पी नही थी और सेना के मेजर बले तिवारी के संपर्क में आने के बाद ध्यानचंद्र को हाॅकी से मोहब्बत हो गई और उनकी ऐसी कला को दुनिया देखती रह गई.

बर्लिन ओलंपिक 1936 और हिटलर

ये कहानी उन दिनों की है जब भारत अंग्रेजो का गुलाम हुआ करता था और भारत यूनियन जैक के हले ओलंपिक में हिस्सा लिया करता था, ध्यानचंद्र उस समय पर भारतीय हाॅकी टीम के कप्तान थे जिस समय ये मैच खेला जाना था. इस मैच से पहले बर्लिन में ही जर्मनी और भारत के बीच एक प्रैक्टिस मैच खेला गया और इस मैच में भारत 4-1 से हार गया.

इस मैच की हार से मेजर इतने दुखी हुए की सारी रात नींद नही आई, उन्होनें आपनी बाॅयोग्राफी गोल में लिखा की मै उस रात हार के चलते सारी रात नही सो पाया और इस हार का दर्द मुझे जिंदगी भर रहेगा. इस मैच में हार की समीक्षा के दौरान ध्यानंचद्र में फाइनल मैच के लिए भारत से फोन पर आईएनएस दारा को बुलवाया और उन्हे फ्लाईट लेकर जल्द से जल्द रिपोर्ट करने के लिए कहा, क्योंकि ध्यानचंद्र इस बात को समझ गए थे की जर्मन छोटे पास को देकर इस मैच को खेलते है और दारा इस तरह के मैचों को खेलने के माहिर थे. 

पहले ये मैच 14 अगस्त को खेला जाना था पर उस दिन भारी बारिश के चलते मैच को पोस्टपोन कर दिया गया और मैच 15 अगस्त को रखा गया. इस मैच को देखने के लिए दुनिया भर से जानी मानी हस्तियां इकट्ठा हुई और मैदान 50 हजार के करीब दर्शकों में खचा-खच भर गया.

इस मैच को खेलने भारत कि रियासतों के राजा और रानी के लगाता जर्मन तानाशाह एडोल्फ हिट्लर भी पहुंचा, मैच शुरू हुआ और भारत में मैच पर अपनी पकड बनानी शुरू कर दी, भारत फस्ट हाॅफ से पहले जर्मनी के करीब 2 गोल से आगे था पर भारत अपने अंदाज में नही आ पाया था, सेकेंड हाॅफ के शुरू में ही ध्यानचंद्र में अपने कीट लगे जूते उतार दिए और नंगे पांव हाॅकी खलने शुरू किया और उनकी हाॅकी के पास जब की गेंद आती तो जर्मनी के खिलाडी के पसीने छूट जाते उनकी लाख कोशिशों के बाद में हो ध्यानच्ंद्र से गेंद नही छीन पाये, इसके बाद जर्मन खिलाडी में रफ हाॅकी खेलना शुरू किया और उनके गोलकीपर की हाॅकी ध्यानचंद्र के मुंह पर लगी और उनका एक दांत टूट गया. 

कुछ देर के उपचार के बाद ध्यानचंद्र फिर मैदान में उतरे और अपनी टीम को निर्देश दिया की अब कोई भारतीय खिलाडी जर्मनी कि टीम के खिलाफ गोल नही करेगा, हम उन्हें भारत की असली ताकत का परिचय कराएगें. इसके बाद ध्यानचंद्र कई बार जर्मनी के डी में गेंद लेकर गए और गोल नही किया. ऐसा उन्होने एक बार नही कई बार किया बाहर देखने वाले हजारों लोग परेशन की ध्यानचंद्र ऐसा क्यों कर रहें हैं पर ध्यानचंद्र हिंदुस्तान की ताकत से दुनिया का परिचय करवाना चाहते थे. भारत नें ये मुकाबला 8-1 के बहुत बडे अतंर से जीता और मेजर ध्यानचंद्र ने इस मैच में 3 गोल किए. 

इसके बाद हिटलर ने अगले दिन ध्यानचंद्र को अपने यहां बुलाया और पूरी दुनिया काफी डरी हुई थी की हिटलर को ये हार कही बर्दाश्त ना हो, पर हिटलर ने ध्यानचंद्र को जर्मनी आने और जर्मनी से हाॅकी खेलने का न्यौता दिया और साथ ही कहा की वो जर्मनी आते है तो उन्हें जर्मन सेना में एयरचीफ मार्शल का पद दिया जाएगा.

पर ध्यानचंद्र के हिटलर के इस प्रस्ताव को नामंजूर कर दिया और कहा की वो अपने देश और उसके लिए हाॅकी खेलने में बहुत खुश है वो नही आ पाएगें.

ध्यानचंद्र से जुडे ऐसे अनेकों किस्से है जो हमें देश प्रेम और देश भक्ती का पढाते है. 

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