लेखिका अशोक कुमारी का लेख, बाबाओं के अनुयायी

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जब मैं हरियाणा अपने ससुराल पहुंची तब सास ससुर ने ऐसी मुस्कराहट से मेरा स्वागत किया जैसे वह मुस्कराहट किसी से उधार मांग कर लाए हों। घर ही नही, पूरे गांव मे भी एक सन्नाटा पसरा हुआ था। जैसे कोई मर गया हो और उसका मातम अभी तक मनाया जा रहा हो। कारण, वो भी जानते थे और मैं भी। अब वे सोच रहे थे कि ‘पता नहीं ये नास्तिक बहू हमें क्या क्या सुनायेगी? जिस बाबा के गुण हमेशा मेरे आगे गाया करते थे आज उसी बाबा को बलात्कार के आरोप में 20 साल की कैद हो चुकी थी। आखिर राम रहीम प्रकरण से कौन वाकिफ नहीं होगा? मैं जानती थी कि आरोपी गुरमीत राम रहीम है, इन भोले भाले अनुयायियों का क्या कसूर जो उस ढोंगी को बचाने में ये भक्त अपनी जान गंवा रहे हैं। परन्तु दुख इस बात का था कि आज भी उन्हें ये लगता है कि बाबा को बदनाम किया जा रहा है, क्योेंकि बाबा प्रसिद्धि की ऊंचाइयों को छू रहे थे और फिल्म के द्वारा अपनी महानता को अपने अनुयायियों के अन्दर पहुंचा रहे थे।

अनुनायियों की इस अंधभक्ति ने मेरी उत्सुकता ऐसे ढोंगी बाबाओं के चक्कर मे फंसने  वाले अंधभक्तों में बढ़ा दी। यही कारण रहा कि अनुयायियों से इस विषय पर बात की। गुरमीत राम रहीम के जेल जाने के बाद इनके अनुयायी तीन तबकों मे बंटे दिखे। कुछ डेरा के भक्त इस विषय पर एकदम खामोश हैं वे कुछ नहीं बोल रहे हैं तो कुछ इसे बाबा की लीला का एक भाग मान रहे हैं।
पेहवा (कुरूक्षेत्र) की सुनीता देवी उम्र 45 वर्ष कहती है कि ‘‘हम नहीं कह सकते कि बाबा बलात्कारी है या नही, हो भी सकता है ये अन्दर की बात है हम तो केवल सत्संग में ही जाते थे’’ वहीं उनके पति जो बाबा के पक्के भक्त थे इस विषय पर कुछ भी बोलने से बचते रहे। कैथल की बोति देवी का कहना है कि जब हमें बाबा के बलात्कारी होने की खबर जानी तो मेरे पति ने बाबा के सारे पफ़ोटो बाहर पफ़ेंक दिए अब हम केवल देवी देवताओं को ही मानते हैं। लेकिन ऐसे अनुनायियों की संख्या बहुत ही कम है। आज भी बाबा  पर लोगों का विश्वास बना हुआ है। राम रहीम के अनुयायी राम रहीम को भगवान की तरह मानते हैं, उनका मानना है कि बाबा ने जिस भक्त पर हाथ रख दिया उसका कल्याण हो जाता है। पेहवा की मित्तो बताती है कि ‘‘ जब मैं दस साल कि थी तब से ही मां पिता के साथ डेरे में जाती रही हूं। शादी के बाद पति के साथ साइकिल पर जाती थी जब से बाबा ने हमारे सिर पर हाथ रखा तब से करोड़ो मे खेलती हूं सब बाबा के आशीर्वाद से हो पाया।’’ बाबा की सजा होने पर वह कहती हैं कि ‘‘यह सतगुरू का मिशन हैं वह जानबूझ कर जेल गए ताकि जेल के कैदियों का कल्याण हो सके। अपना मिशन पूरा करके  वह जल्द ही आ जायेंगे। जिस दिन बाबा नही रहेंगेे यह दुनिया समाप्त हो जायेगी।’’ कुछ इसी तरह का मानना रामपाल के भक्त संजीव (25) का है कि ‘‘अगर रामपाल बाबा जेल गए हैं तो उसके पीछे जेल का कल्याण करना है, नही तो कोई सरकार व कानून उन्हे पकड़ नही सकता था’’।

जब इन बाबाओं के अनुयायियों से पूछा कि वे बाबा से क्यों जुडं़े, सभी का लगभग एक सा जवाब था ‘सदाचार के कारण’। सौदागर बौद्ध (25वर्ष) जो मधु किश्वर परमहंस से जुड़े है, वे कहते है कि जब मैने पहली बार गुरूजी के वचन सुने तो उन्होने कहा ‘अपने हक की खाओ’ इससे दूसरों को जीने का अधिकार मिलेगा और सभी को रोजगाार के अवसर भी उपलब्ध होंगे, और समाज का कल्याण होगा। दिल्ली की रहने वाली सुनीला(52) निरंकारी की सेवादार हैं और 15 साल से निरंकारी से जुड़ी हुई है। वह बताती है कि ‘‘पहले पति बहुत पीते थे, मुझे मारते थे, घर खर्च भी नहीं देते थे, मैं रोज भगवान से प्रार्थना करती थी, मन्नत मांगती थी कि शराब छोड़ दें लेकिन कोई असर नही होता था, जब से मैं सत्संग जाने लगी इन्होंने पीना कम कर दिया अब मेरे साथ सत्संग भी जाते हैं। जब से मै निरंकारी से जुड़ी मेरे घर खुशहाली आ गई’’। इन बाबाओं से जुड़ने का यह एक बहुत बड़ा कारण है गुरू अपने अनुयायियों से मदिरा व दूसरे पदार्थ छोड़ने के लिए कहते है।

बेटी बचाओं बेटी पढ़ाओं का नारा देने वाले हरियाणा राज्य में महिलाएं जब बेटे की मनोकामना करती है तब गुरू उन्हें बेटे की प्राप्ति का आर्शीवाद देते हैैं। हरियाणा, पंजाब जैसे राज्यों में पितृसत्तात्मक मूल्यों के कारण ऐसी मांग करना व पूरी होने का सारा श्रेय भक्त लोग बाबाओं को देते हैं हलांकि जन्मपूर्व लिंग परीक्षण क्लीनिक भी इसी कारण खूब फल-फूल रहे हैं।
भारत धर्म, वर्ण, वर्ग, भाषा क्षेत्र संस्कृति आदि के आधार पर बंटा हुआ विभिन्नताओं वाला देश है, यहां अनेेेक धर्म के साथ साथ अनेक पंथ भी है इन पंथो के हजारों डेरे है। केवल उत्तर भारत में ही कुछ बड़े डेरे जैसे- डेरा सच्चा सौदा, राधास्वामी सत्संग व्यास, दिव्य ज्योति जागरण संस्थान, नूरमहल, डेरा सच्चखंड बल्लान, संत निरकारी मिशन, बनामधारी आदि है। आर्ट ऑफ लिविंग वाले श्री श्री रविशंकर की 152 से ज्यादा देशों में शाखाएं है और 37 करोड़ से ज्यादा लोग उनसे जुड़े हुए हैै। निरंकारी मिशन के 669 आश्रम है, विदेशाें में 87 आश्रम हैं और एक करोड़ से ज्यादा लोग निरंकारी मे आस्था रखते हैं। राधास्वामी पंथ में विश्वास रखने वालों की संख्या 30 लाख से अधिक हैैं। डेरा सच्चा सौदा के अनुयायी भी अमेरिका,ब्रिटेन, कनाडा, आस्ट्रलिया तक फैले हैं। इनके अनुयायियों की संख्या लगभग 5 करोड़ हैं जिसमें से हरियाणा में ही 25 लाख से ज्यादा सर्मथक हैं।

आसाराम के भी 425 आश्रम हैं और लाखों की संख्या में अनुयायी हैं। अब लाखों करोड़ाें की संख्या में भक्त होंगे तो कमाई भी अरबों में ही होगी। यही कारण है कि इन बाबाओं पर पैसे और ताकत का नशा इतना अधिक चढ़ जाता हैं कि वे खुद को कानून से ऊपर समझने लगते है। लाखों करोड़ो भक्तों के सहारे अपने कमांडो भी तैयार कर लेते हैं और आश्रमों के नाम पर विशाल साम्राज्य खड़ा कर लेते हैं जिसमें आधुनिक विलासिता की सभी सुविधाएं उपलब्ध होती हैं जैसे- स्वीमिंग पूल, लग्जरी गाडिया, थियेटर, रिमोट संचालित कुर्सियां आदि यहां तक की आधुनिक गैर लाइसेेेंस हथियार भी रखते है। इसके अलावा इनके अपने स्कूल कॉलेज, मार्केट भी बने हुए हैं। 

हरियाणा में डेरा समर्थकों में दान देने की होड़ लगी रहती है प्रत्येक जिले का अपना फंड क्लेक्शन होता है। अनुयायियों ने यह कभी नहीं बताया कि वे कितना दान देते हैं लेकिन हमारे घर अक्सर इस बात की चर्चा होती थी कि पेहवा हमेशा दान देने में प्रथम श्रेणी प्राप्त करता रहा है। डेरे के रिवाज के अनुसार अधिक से अधिक दान देने वाले क्षेत्र को इनाम स्वरूप डेरे की तरफ से ट्राफी प्रदान की जाती है जिसमें पेहवा के हिस्से कई बार ट्राफी आई हैै। डेरे की एक अनुयायी मित्तों से इस विषय पर बात की तो उसने यह बताया की ‘‘बाबा को मैं सब कुछ दे दूं तो भी कम है, यह लगा लो की मैनेे तो प्लॉट तक दान किया है। ऐसे ही भक्त हाईकोर्ट के उस आदेश के बाद जिसमें डेरे की संपत्ति को सलंग्न करने को कहा गया है उसके खिलाफ अपील की कि हमारी दान की गई संपत्ति को सील न किया जाए। सतपाल के अनुयायी संदीप कहते हैं कि बाबा ने कभी पैसे नही मांगे हम तो अपनी मर्जी से 10-20 रुपये दान दे देते हैं। जबकि इनके अनुयायियों में गरीबों की संख्या ज्यादा है मगर बाबा लोग इन गरीबों की गाढ़ी कमाई से अमीर हैं।

भारत में जातीय भेदभाव व जातीय उत्पीड़न के कारण लोग इन बाबाओं के पास जाते हैं जहां पर अक्सर समानता की बात की जाती है। डेरा सच्चा सौदा, व्यास, निरंकारी मिशन, सतपाल के अनुयायियों में अधिकांश दलित व पिछड़े वर्ग के लोग शामिल हैं जब वे यहां ऊंची जातियों जाट व सिख के साथ लंगर में बैठते हैं तो एक समानता व आत्मविश्वास का अनुभव करते हैैं। हलांकि डेरे के बाबा लोग कभी भी उनकी  जातीय पहचान खत्म करने की बात नहीं करते इसका मतलब यह है कि जातीय व्यवस्था को बनाये रखते हुए छद्म समानता इन डेरों में देखने को मिलती है।

वास्तविकता यह है कि चाहे नेता हो या समाज सुधारक कहने वाले बाबा ये सभी भारतीय सामन्तीय व्यवस्था को बनाये रखते हुए अपना उल्लू सीधा करना चाहते हैं, यही कारण है की भारत देश आई टी सेक्टर, सेटेलाइट लांचिंग जैसे विज्ञान व तकनीक के क्षेत्र में झंडे गाड़ रहा है तो वहीं दूसरी ओर अंधभक्तों की फौज पैदा हो रही हैं, जो भावनाओं के ज्वार मे हिंसा पर उतारू हो कर अपने ही संसाधनों का नुकसान कर रहे हैं। किसी भी सरकार ने कभी इन अनुयायियों की सामाजिक आर्थिक पृष्ठभूमि को जानने का प्रयास नही किया। राजनैतिक दल के निगाह में इनकी हैसियत एक वोट बैंक से अधिक कभी नहीं रही। देश के विकास और आर्थिक नीतियां भले ही किसान, बेरोजगाार, युवकों, मजदूरों को केन्द्र में रखकर बनती हो परन्तु उनका लाभ इन लोगों तक नाममात्र तक पहुंचता है।

ऐसी परिस्थिति में इन लोगाें को सामाजिक, धार्मिक आर्थिक और राजनैतिक हर स्तर पर उपेक्षा का जीवन जीने के लिए विवश होना पड़ता है। विकास के झूठे दावों और उसकी हकीकत से आई इस शून्यता ने ऐसे बाबाओं को पनपने का मौका दिया। दैनिक समस्याओं जैसे बेरोजगारी, अशिक्षा, गरीबी आदि से छुटकारा पाने की उम्मीद में लोग ढोंगी बाबाओं के चक्कर मे फंस जाते हैं। बाबाओं के निरंतर बढ़ते वैभव और तिलिस्म के चंगुल मे फंसकर ये भक्त सभी प्रकार की समस्याओं के निवारण के लिए इन बाबाओं द्वारा मुक्ति की आस लगाते है। पिछड़े व गरीब तबकों को कथित चमत्कारों के बल पर जमीनी हकीकत  के बजाय अलौकिक दुनिया में ले जाने की आड़ में हर तरह के गैर कानूनी कारोबार करने लगते हैं। यही कारण है कि इन बाबाओं ने अपनी करंसी बना ली, अपने नाम के उत्पाद अनुयायियों को बेचते है जिससे इनकी काली कमाई होने लगी।

गुरमीत राम रहीम के गद्दी संभालते ही डेरे के अनुयायियों की संख्या मे काफी वृद्धि हुई इसका कारण यह है की डेरा सच्चा सौदा ने बीते सालों में ‘सामाजिक समरसता’ बढ़ाने, ‘नशामुक्ति और मानव सेवा’ के कई कैम्प आयोजित किए। मोदी के स्वच्छता अभियान के तर्ज पर 1 सितंबर 2015 को ‘महासफाई’ अभियान चलाया गया। अभी हाल ही में मई 2017 मे ‘पृथ्वी साफ मिटे रोग अभिशाप,’ ‘स्वच्छ भारत’ कैम्पेन चलाया। इस तरह के कार्यक्रमाें के कारण बाबा के अनुयायी बाबा के अंधभक्त बनने लगे। इस अंधभक्ति के उन्मादी पागलपन में ये लोग कुछ भी कर गुजरने को तैयार रहते हैं। उन्हें यह यकीन ही नहीं होता कि उन लोगो के जैसे ही ये बाबा लोग भी हाड़-मांस के बने हुए इंसान ही है जिनके अन्दर काम, क्रोध, लोभ, मोह भड़ा हुआ है। आम लोगों की भान्ति इन बाबाओं की भी अपनी जरूरतें व सीमाएं है। इन जरूरतों को पूरा करने के लिए कई बार इन बाबाओं में हैवानियत जाग उठती है।

वास्तव मे आज भारतीय शहरी व ग्रामीण को जागरुक इंसान बनने के साथ साथ तार्किक शिक्षा प्राप्त करने की आवश्यकता है जिससे कि वे भावनाओं के स्थान पर तर्क बुद्धि का उपयोग कर सकें।

लेखिका अशोक कुमारी, दिल्ली विश्वविद्यालय के बौद्ध अध्यन विभाग में शोधार्थी है,

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