चौकीदार के बेटे- आॅलराउंडर रविंद्र जडेजा की बायोग्राफी

हिंदूस्तान में क्रिकेट को किसी धर्म से कम नही माना जाता, इसे एक ऐसे खेल को रूप में भी देखा जाता है जो पूरे भारत को एक सूत्र में पियो सकता है. इस देश में पैदा होने वाले लगभग सभी बच्चो ने बच्पन के दिनों में  सचिन बनना का सपना एक ना एक बाद जरूर देखा होता है, ऐसे की हजारों सपने बच्पन की दहजीज पार करने के साथ ही टूट जाते है और जीवन भर मन के किसी को में इस टीस का अहसास बचा रह जाता है. ऐसा ही एक सपना गुजरात जिसे के नावगांव में राजपूत परिवार में पैदा होने वाले रविंद्र जडेजा के मां-पिता नें देखा, वो अपने बच्चे रविंद्र को भारतीय क्रिकेट टीम का हिस्सा बनते हुए देखना चाहते थे.

पर सपने और हकीकत के बीच गहरा फासला होता है, और इस फासले का पूरा करने के लिए कडी मेहनत लगती है, और ऊपर से गरीबी में इस तरह का सपना देखना किसी गुनाह से कम नही होता, पर रविंद्र, उनके पिता श्री अनिरूध सिंह जडेजा माता लता ने ये सपना देखा और पूरे जी जान के साथ इस सपने को पूरा करने में जुट गए.

रविंद्र के पिता चौकीदारी का काम करते थे, और काफी मुश्किल से जीवन में गुजारा पूरा हो पाता था, उनके परिवार में बेटे के अलावा दो बेटीया नैना और पद्मनी भी है जिनके पढाई लिखाई के खर्च में पिता के ऊपर ही था, पर उन्होने जीवन में चुनौती का मुकाबला किया और बेटे रविंद्र के सपनो के साथ अपने सपनो को जोड दिया और गली मौहल्ले के क्रिकेट से उन्हे बाहर निकाल कर किक्रेट आकादमी में आगे की ट्रेनिंग का रास्ता दिखाया. 

रविंद्र में अपने परिवार की परिस्थितियों को समझते हुए अपने सपनो को पूरा करने के लिए खुद को पूरी तरह से झोक दिया और ट्रेनिंग के लिए सुबह सबसे पहले पहुंचते और सबसे आखिरी तक जम कर ट्रेनिंग करते. रविंद्र जडेजा कि गिनती आज दुनिया के बेहतरीन फिल्डर में कि जाती है, पर इसके पीछे रविंद्र की जी तोड ट्रेनिंग बहुत कम लोगो को दिखाई देती है.

उनकी मेहनत धीरे-धीरे रंग लाने लगी और सलेक्सन अंडर 19 टीम में हुआ और उसी साल उनको अडर-19 विश्व कप टीम का हिस्सा बनाया गया और रविंद्र आपनी मां के सपनो को पूरा करने की दिशा में तेजी के साथ आगे बठने लगा, इस बीच साल 2005 में उनके जीवन में कुछ ऐसा हुआ जिसके बाद उनका क्रिकेट समेत दुनिया से मोह भंग हो गया. 

एक भीष्ण कार एक्सीडेंट के दौरान इनकी मां लगा जडेजा ने दुनिया को अलविदा कह दिया और इस हादसे में रविंद्र को जीवन में तोड कर रख दिया और वो काफी वक्त तक अकेले और गुमसुम रहने लगे, यही वो वक्त था जब रविंद्र ने क्रिकेट खेलना बंद कर दिया. काफी दिनो के बाद रविंद्र ने खुद को सम्हालना शुरू किया और आपनी मां के अधूरे सपने को पूरा करने में जुड गए.

8 फरवरी 2009 को वो वक्त आया जब जडेजा के जीवन भर की मेहनत का फल मिला और उनकी मां का उनको भारतीय टीम में खेलने का सपना पूरा हुआ. श्रीलंका के खिलाफ हुए इस मैच में रविंद्र में 60 रनो का स्कोर खडा बनाया. इसके बाद काफी दिनों तक उनके करियर में उतार चढाव का दौर चलता रहा और कई बार उनको टीम से बाहर जाने की नौबत तक आ गई और रविंद्र जडेजा के क्रिकेट करियर में महेद्र सिंह धोनी जैसे कप्तान की भूमिका भी काफी अहम हो जाती है, महेंद्र ने कई मौको पर रविंद्र जडेजा पर विश्वास दिया और प्रदर्शन अच्छा ना होने के बाद थी उनको मौका दिया.

आज रविंद्र जडेजा को बेहद सफल क्रिकेट खिलाडी के रूप में देखा जाता है और उनका स्थान भारतीय क्रिकेट टीम में पक्का हो चुका है.

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